कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित | Kabir das ji Ke Dohe with Meaning in Hindi

कबीर दास जी हिंदी साहित्य के महान संत और कवि थे, जिन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जीवन की सच्चाई, धर्म, कर्म और मानवता का संदेश दिया। उनके दोहे सरल भाषा में होते हैं, लेकिन उनमें गहरा अर्थ छिपा होता है। आज भी कबीर के दोहे हमें सही रास्ता दिखाते हैं और जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देते हैं। इस लेख में हम कबीर के प्रसिद्ध दोहे उनके हिंदी अर्थ सहित जानेंगे।

Kabir Ke Dohe with Meaning in Hindi

संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे और उनके अर्थ
Kabir ke dohe with meaning in Hindi
  • गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाय।
    बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताए॥
    गुरु और गोविन्द दोनों खड़े हैं, समझ नहीं आता पहले किसको नमस्कार किया जाय! पहले गुरु को ही नमस्कार करना उचित होगा क्योंकि गुरु ने ही गोविंद के बारे में बताया है!
  • गुरु गोविन्द दोऊ एक हैं, दूजा सब आकर।
    आपा मेटैं हरि भजैं, तब पावैं दीदार॥
    गुरु और ईश्वर में कोई अन्तर नहीं है, दोनों एक ही हैं। बाहर से दोनों में भले ही अन्तर है, पर अन्दर से दोनों एक ही हैं। मन से ” मैं ” की भावना को निकालकर हरि को भजने से मन का सारा मैल निकल जाता है, और तब हरि का दर्शन हो जाता है।
  • गुरु बिन ज्ञान ना उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
    गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥
    गुरु के बीना ज्ञान नहीं मिलता और गुरु के बीना मोक्ष भी नहीं मिलता! गुरु के बिना सत्य की पहचान नहीं होती और गुरु के बिना मन का भ्रम भी दूर नहीं होता!
  • गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।
    तीन लोक की संपदा, सो गुरु दीन्ही दान॥
    गुरु के समान इस संसार में कोई देने वाला नहीं है और शिष्य के समान कोई मांगने वाला भी नहीं है! गुरु तो ऐसे होते है कि तीनों लोकों का ज्ञान शिष्य को एक इशारे में दे देते हैं!
  • गुरु सों ज्ञान जु लीजिए, सीस दीजिए दान।
    बहुतक भोंदू बह गये, राखि जीव अभिमान॥
    गुरु से ज्ञान लेते समय अपना सर उनके चरणों में झुका दीजिए! गुरु के सामने अकड़ दिखाने वाले बहुत से अज्ञानी इस दुनिया से बह गए अर्थात् कभी कल्याण न प्राप्त कर सके!
  • गुरु पारस को अन्तरो, जानत है सब संत।
    वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत॥
    सभी ज्ञानी लोग, गुरु और पारस पत्थर के अन्तर को भलीभांति समझते हैं! पारस पत्थर लोहे को सोना करता है और गुरु अपने शिष्य को ज्ञान का बोध कराकर उसे महान बना देता है!
  • गुरु शरणागति छाड़ि के, करै भरोसा और।
    सुख सम्पत्ति को कह चली, नहीं नरक में ठौर॥
    गुरु का साथ छोड़कर जो व्यक्ति दूसरों पर विश्वाश करता है, उसको सुख सम्पत्ति तो मिलती नहीं ऊपर से नरक के द्वार भी उसके लिए बंद हो जाते हैं!
  • गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
    अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
    गुरु कुम्हार के समान और शिष्य कच्चे घड़े के समान है, जैसे कुम्हार घड़े को मज़बूत और टिकाऊ बनाने के लिए अंदर से हाथ लगा कर बाहर से थपथपाता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी शिष्य को ठोक-पीटकर संसार में एक आदरणीय व्यक्ति बना देता है! “गुरु की प्रताड़ना स्वाभाविक और शिष्य के हित में है!”
  • गुरु को सिर पर राखिए, चलिए आज्ञा माहि।
    कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाहिं॥
    गुरु को सिर का ताज समझकर उनकी आज्ञा को जो कोई नर मानते हैं, तीनों लोकों में वे सभी प्रकार का भय से मुक्त हो जाते हैं!
  • कबीर हरि के रूठते, गुरु के शरणै जाय।
    कहै कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय॥
    कबीर जी कहते हैं कि यदि हरि आपसे रूठ जाते हैं तो गुरु की शरण में जाने से बात बन जाती है, किन्तु यदि आपसे गुरु रूठ जाते हैं तो हरि के पास जाने से भी लाभ नहीं होता है! अतः गुरु को प्रसन्न रखना सर्वदा उचित है!
  • कबीर ते नर अंध है, गुरु को कहते और।
    हरि के रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥
    वे लोग अंधे हैं, जो गुरु को कोई महत्व नहीं देते क्योंकि हरि के नाराज हो जाने पर गुरु के चरणों में स्थान मिल जाता है किंतु गुरु के नाराज हो जाने पर हरि के चरणों में भी स्थान नहीं मिलता।
  • भक्ति पदारथ तब मिले, जब गुरु होय सहाय।
    प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय॥
    कबीर जी कहते हैं कि भगवान की भक्त अभी प्राप्त होती है, जब गुरु कृपा होती है! बिना गुरु की अनुकंपा के भगवान की भक्ति को प्राप्त करना असंभव कार्य है!
  • तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान।
    सुमति गयी अति लोभते, भक्ति गयी अभिमान॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्य के दिखते ही अंधकार गायब हो जाता है और दुर्बुद्धि गुरु का ज्ञान पाकर दूर हो जाती है, ठीक उसी तरह अधिक लोभ के होने से सद्बुद्धि समाप्त हो जाती है और अत्यधिक अहंकार के होने से भक्ति चली जाती है!
  • भाव बिना नहिं भक्त जग, भक्ति बिना नहिं भाव।
    भक्ति—भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव॥
    बिना भाव के संसार में किसी को भक्ति नहीं मिलती है और बिना भक्ति के भाव भी किसी के अन्दर नहीं आता है! भक्ति व भाव ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों का स्वभाव एक जैसा ही है!
  • कामी क्रोधी लालची, इनते भक्ति ना होय।
    भक्ति करै कोई सूरमा, जादि बरन कुल खोय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति कामी क्रोधी और लालची प्रवृति के होते है उनसे भक्ति हो ही नहीं सकती! भक्ति करना सूरमाओं का काम है, भक्ति तो केवल वही कर सकता है जिसने अपने खानदान, परिवार, कुल और अहंकार का त्याग कर दिया हो! ” यह हर किसी के बस की बात नहीं! “
  • देखा देखी भक्ति का, कबहू न चढ़सी रंग।
    विपत्ति पड़े यों छाड़सि, केचुलि तजसि भुजंग॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों को भक्ति करता देख स्वयं भक्ति करने वाले लोगों की भक्ति कभी सफ़ल नहीं हो सकती! ऐसे लोग जो इस प्रकार की भक्ति करते हैं, मुसीबत पड़ने पर इस भक्ति को उसी प्रकार छोड़ देते हैं जिस प्रकार एक सर्प अपनी केचुली को छोड़ देता है।
  • भक्ति-भक्ति सब कोई कहै, भक्ति न जाने भेद।
    पूरण भक्ति जब मिले, कृपा करै गुरुदेव॥
    भक्ति भक्ति तो हर कोई कहता है लेकिन भक्ति का अर्थ कोई नहीं जानता! पूर्ण रूप से भक्ति तभी प्राप्त होती है, जब गुरुदेव की कृपा होती है।
  • कबीर या संसार की, झूठी माया-मोह।
    जिहि घर जिता बधावना, तिहि घर तेता दोह॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि यह सांसारिक मोह-माया सब एक कड़वा झूठ है क्योंकि जिस घर में जितनी ही दौलत और सुख सुविधा होती है वहां पर उतना ही दुःख होता है।
  • कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खांड।
    सद्गुरु की कृपा भई, नातर करती भांड॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि यह माया बिल्कुल खांड (चीनी / Suger) की तरह बहुत मोहिनी और मीठी है, जो भी इसमें उलझ गया वह जल्दी बाहर नहीं आ पता! सद्गुरु की मुझ पर बहुत कृपा हुई थी की मैं इस माया के मोहपाश में नहीं बंधा।
  • माया छाया एक सी, बिरला जानै कोय।
    भगता के पीछे फिरै, सनमुख भाजै सोय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि माया और छाया दोनों एक समान हैं, इस बात से बहुत कम लोग ही वाकिफ हैं! ये दोनों भक्तजनों के पीछे-पीछे और कंजूसजनों के आगे-आगे भागती हैं, इन्हें कोई छू तक नहीं सकता।
  • माया दोय प्रकार की, जो कोय जानै खाय।
    एक मिलावै राम को, एक नरक ले जाय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि माया के दो रूप हैं,जब व्यक्ति माया का इस्तेमाल देव कार्य के लिए करता है तो उसका भला होता है (यह माया का पहला रूप है), और जब व्यक्ति इसका इस्तेमाल आसुरी शक्तियों को बढ़ाने के लिए करता है तो उसका जीवन नरक बन जाता है (जो कि माया का दूसरा रूप है)!
  • मोटी माया सब तजैं, झीनी तजी न जाय।
    पीर पैगम्बर औलिया, झीनी सबको खाय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि मोटी माया यानी धन, परिवार, घर आदि का त्याग तो इंसान कर देता है, किन्तु झीनी माया यानी रूप, यश, सम्मान आदि का त्याग नहीं कर पाता है! और यही झीनी माया यानी छोटी माया ही सब दुखों की जननी है।
  • माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि माहि परन्त।
    कोई एक गुरु ज्ञान ते, उबरे साधु सन्त॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि माया दीपक की लौ की तरह है और मनुष्य पतंग(कीड़े- मकौड़े) की तरह है जो बार बार उस पर आकर मंडराता रहता है! माया के इस कुचक्र से कोई बिरला ही स्वयं को निकाल पाता है।
  • काल हमारे संग है, कस जीवन की आस।
    दस दिन नाम संभार ले, जब लग पिंजर सांस॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जब काल आठों प्रहर हमारे साथ है तो फिर जीने की यह उम्मीद कैसी ? यह जीवन मिथ्या है, जब तक प्राण हैं अपने इस लोक-परलोक को संवार लो क्योंकि जब काल आ जायेगा तब यह मौका नहीं मिलेगा!
  • जंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय।
    ते भी होते मानवी, करते रंग रलियाय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जब निधन हो जाता है तब मारे हुए शरीर को जला दिया जाता है, मृत शरीर के स्थान पर केवल रख की ढेर रह जाती है, जिस पर समय के साथ हरी घास भी उग जाती है! जीवन के इस मर्म को जनों कि वो भी तो कभी मनुष्य ही थे जो घूमने-फिरने और रंग-विलास में डूबे रहते थे और आज उनके मृत शरीर पर घास उग आई है।
  • हरिजन आवत देखि के, मोहड़े सूख गयो।
    भाव भक्ति समुझयो नहीं, मूरख चूकि गयो॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान के भक्तों को सामने आता देखकर जिनके मन में प्रसन्नता/खुशी/उत्साह उत्पन्न नहीं होता, ऐसे व्यक्ति को मूर्ख ही कहा जायेगा! क्योंकि उसने खुद के भीतर भक्ति का भाव उत्पन्न करने का या प्रभू के समीप जाने का एक अच्छा मौका गंवा दिया।
  • दीपक सुंदर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग।
    बढ़ी लहर जो विषय की, जरत न मारै अंग॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि दीपक की सुंदर लव को देखकर जैसे कीट- पतंग जल- जलकर मर जाते हैं! ठीक वैसी ही स्थिति कामी पुरुष की है, जो विषय वासना की लौ की खूबसूरती में उलझकर नाना प्रकार के दुखों को भोगता है और एक दिन वह भी वासना की लौ में जलकर मर जाता है।
  • कबीर गुरु के देश में, बसि जानै जो कोय।
    कागा ते हंसा बनै, जाति वरन कुल खोय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि गुरू के देश में जो रहता है यानी गुरू की कृपा जिस पर बरसती है और जो गुरु का कहना मानता है! वह व्यक्ति अपनी जाति कुल गोत्र को भूलकर कौवे से हंस बन जाता है यानी उसके मन के सारे मैल धुल जाते हैं और वह यशस्वी बन जाता।
  • गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
    लोक वेद दोनों गए, आये सिर पर काल॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति गुरु की आज्ञा को नहीं मानता है और मनमानी आचरण करता है! उसके लोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जाते हैं और वह सदा ही दुखों से घिरा रहता है।
  • माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं।
    मनवा तो चहु दिश फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि प्रभू का जप करते समय माला तो हाथ में फिर रही है और जीभ मुंह में फिर रही है! किंतु मन तो चारों दिशाओं में घूम रहा है, फिर यह सुमिरन कहां हुआ ? यह हरि नाम लेना तो हुआ नहीं, यह तो मात्र दिखावा है।
  • गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय।
    कहैं कबीर सो संत प्रिय, बहु विधि अमृत पाय॥
    कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति गुरु की आज्ञा लेकर आता है और गुरु की आज्ञा लेकर ही जाता है, अर्थात गुरु जैसा आचरण करने को कहते हैं वह वैसा ही करता है! उससे गुरु बहुत ही प्रेम करते हैं और गुरु की कृपा से ही उस पर सुख-समृद्धि रूपी अमृत वर्षा हमेशा होती रहती है!
  • प्रीति पुरानी न होता है, जो उत्तम से लाग।
    सो बरसां जल में रहे, पथर न छोड़े आग॥
    कबीर दास जी कहते हैं कि जैसे पत्थर सैकड़ो साल पानी में रहने पर भी आग उत्पन्न करने की क्षमता को नहीं छोड़ता है, ठीक उसी प्रकार यदि उत्तम स्वभाव वाले व्यक्ति से प्रेम हो जाए तो वह कितना भी पुराना क्यों ना हो जाए, उसमें कमी नहीं आती है।
  • प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की होय।
    उत्तम प्रीति सो जानियो, सतगुरु से जो होय॥
    कबीर दास जी कहते हैं कि संसार में प्रेम के कई रंग-रूप है और यह नाना प्रकार का होता है! लेकिन उत्तम प्रेम वही है जो सद्गुरु से होता है क्योंकि इस प्रेम के परिणाम सदा अच्छे ही होते हैं।
  • साधु संगत परिहरै, करै विषय को संग।
    कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति बुद्धिमानों (साधुओं ) का साथ छोड़कर, मूर्खों (व्यभिचारियों )के संग विचरण करता है! वह उन मूर्ख लोगों की श्रेणी में आ जाता है जो गंगाजल को छोड़कर कुआं खुदवाते हैं।
  • कामी का गुरु कामिनी, लोभी का गुरु दाम।
    कबीर का गुरु संत है, संतन का गुरु राम॥
    कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग कामी होते हैं उनका सब कुछ सुंदर स्त्री होती है, जो लोग लोभी होते हैं उनका सब कुछ दाम यानी धन होता है! लेकिन अच्छे लोगों का गुरु हमेशा सज्जन व्यक्ति ही होते हैं और संतों का गुरु ईश्वर होता है।
  • परारब्ध पहिले बना, पीछे बना शरीर।
    कबीर अचम्भा है यही, मन नहिं बांधे धीर॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि पहले हमारा भाग्य बना है उसके बाद यह शरीर! लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि मन को थोड़ा सा भी धैर्य नहीं है, वह सब कुछ जानता है फिर भी उसे संतोष नहीं है।
  • जहां काम तहां नाम नहिं, जहां नाम नहिं काम।
    दोनों कबहू ना मिलै, रवि रजनी इक ठाम॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जहां काम रूपी वासना होती है, वहां ज्ञान और ईश्वर दोनों ही नहीं होते और जहां ज्ञान होता है वहां कामरूपी वासना का वास नहीं होता है! अर्थात जिस प्रकार सूर्य और रात एक साथ नहीं रह सकते ठीक उसी प्रकार काम और सद्गुरु भी एक साथ नहीं रह सकते हैं।
  • राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय!
    जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जब उनका मृत्यु का समय नजदीक आया और राम ने अपने दूतों को उन्हें लाने भेजा तो कबीर दास जी रो पड़े क्यूंकि उन्हें लगने लगा था कि जो आनंद संत और सज्जनों की संगति में आ रहा है उतना आनंद तो स्वर्ग में भी नहीं मिलेगा।
  • पाप करे ते हरि मिले, पाप करे ते चैन।
    पाप करे सबकुछ मिले, पाप करो दिन रैन॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीरदास जी कहना चाह रहे हैं कि हरि के चरणों को पकड़ने से अर्थात् लगातार उनके चरणों का स्मरण करने से ही हमें हरि मिल जाते हैं, शान्ति मिल जाती है और जो भी हमारी इच्छाएं हैं सब पूर्ण हो जाती हैं! इसलिए हमें निरन्तर हरि की शरण में ही रहना है क्योंकि जीवन की सार्थकता हरि की शरण में ही है।
  • अटपट ज्ञान कबीर का, झटपट समझ ना आए!
    झटपट समझ जाए तो, सब खटपट ही मिट जाए॥
    प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास स्वयं कहना चाह रहे हैं कि उनके ज्ञान को समझ पाना कोई साधारण बात नहीं है, उन्हें केवल विवेकी पुरुष ही समझ कर स्वयं को काल की धारा अर्थात् जन्म मरण के चक्कर से बच पाता है! साधारण लोग उनकी बातों का कुछ अलग ही अर्थ निकाल लेंगे और सदा काल की धारा में ही फंसे रह जायेंगे।
  • कबीर सपनें रैन के, ऊपरी आये नैन!
    जीव परा बहू लूट में, जागूं लेन न देन॥
    संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है कि रात में सपना देखते देखते हुए अचानक आंखें खुल जाती है तो प्रतीत होता है कि हम तो व्यर्थ के ही आनंद या दुःख में पड़े थे। जागने पर पता लगता है कि उस सपने में जो घट रहा था उससे हमारा कोई लेना देना नहीं था। ठीक उसी प्रकार यह जीवन भी एक तरह से सपना ही है। इसमें दुःख और सुख भी एक भ्रम हैं। मनुष्य को यह देह इस संसार का आनंद लेने के लिये मिली है जिसके लिये यह जरूरी है कि भगवान भक्ति और ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त किया जाये न कि विषयों में लिप्त होकर अपने को दुःख की अनुभूति कराई जाये।
  • दया धर्म का मूल है, पाप मूल संताप!
    जहां क्षमा वहां धर्म है, जहां दया वहां आप॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कहना चाहते हैं कि धर्म रूपी पेड़ की जड़ दया भाव है और दुःख रूपी पेड़ की जड़ पाप है, अतः हमें समझना चाहिए कि जहां पर क्षमाभाव है वहीं धर्म का वास है और जहां पर दयाभाव है वहीं पर ईश्वर का वास है।
  • जाका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध!
    अनेधे को अंधा मिला, पड़ा काल के फंद॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि अगर गुरु अज्ञानी है तो शिष्य ज्ञानी कैसे हो सकता है, दूसरे शब्दों में कहें तो यदि अंधे को मार्ग दिखाने वाला ही अगर अंधा मिल जाए तो वह सही मार्ग कैसे दिखाएगा? ऐसे गुरु-चेले समय के फंदे में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं!
  • साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं।
    धन का भूखा जो फिरै, सो तो साधु नाहिं॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि संतजन भाव के भूखे होते हैं और धन का लोभ उनको नहीं होता, जो धन का भूखा होकर लालच में इधर- उधर घूमता रहता है, वह सच्चा साधु ही नहीं है!
  • चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाए।
    वैद्य बिचारा क्या करे, कहां तक दवा खवाय॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि चिंता ऐसी डायन(राक्षसी) है, जो कलेजे को भी काट कर खा जाती है! इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता, वह चाहे कितनी ही दवा क्यों न लगा ले!! दूसरे शब्दों में, कहते हैं न कि मन के चिंताग्रस्त होने की स्थिति कुछ ऐसी होती है, जैसे समुद्र के भीतर आग लगी हो, इसमें से न धुआं निकलता है और न वह किसी को दिखाई देता है। इस आग को वही पहचान सकता है, जो खुद इस से हो कर गुजरा हो।
  • अपना तो कोई नहीं देखा ठोंक बजाएं।
    अपना-आपना क्या करे मोह भरम लपटाय॥
    प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि जीव असंग है, सारा संबंध देहगत है, दैहिक संबंध में भी जब तक स्वार्थ सधता है तभी तक सभी अपने लगते हैं! स्वार्थ में कमी आते ही अपने भी पराये हो जाते हैं, मैंने ठोक बजा करके देखा है की दुनिया मतलबी है, जिसको लोग अपना-अपना करते रहते हैं वह सिर्फ मोहवश है, भ्रम से लगता है अपने हैं। माता- पिता अपने बच्चों को कितने लाड़ प्यार से अपना है कह कर पाले रहते हैं लेकिन वही बच्चे बड़े होने पर माता-पिता को वृद्ध आश्रम का राह दिखाते हैं दुर्गति करने में कोई कमी नहीं करते।
  • प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।
    जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता! प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जिस मार्ग पर चलकर परमात्मा की भक्ति और ज्ञान को प्राप्त किया जा सके ।
  • झुठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत।
    राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हे मनुष्य! ये संसार झूठा और असत्य पर टिका है जहाँ कोई अपना मित्र और सम्बंधी नहीं है! इसलिए तू यदि इस सब से छुटकारा पाना चाहता है तो बस राम – नाम की सच्चाई को जान ले ऐसा करने से ही इस भवसागर से मुक्ति मिल पाएगी ।
  • कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढै बन माहि।
    ऐसे घट घट राम है, दुनिया देखै नाँहि॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार कस्तूरी हिरण अपनी नाभि से आती हुई कस्तूरी की सुगंध पर मोहित रहता है परन्तु वह यह जानता ही नहीं कि यह सुगंध उसकी नाभि में से आ रही है और वह उसे प्राप्त करने के लिए वन में इधर-उधर भटकता रहता है! उसी प्रकार मनुष्य और आजकल के ढोंगी बाबा भी अज्ञानतावश वास्तविकता को नहीं जानते कि ईश्वर हमीं में निवास करता है और उसे प्राप्त करने के लिए फालतू के आडंबर, धार्मिक स्थलों, अनुष्ठानों में भटकते रहते हैं।
  • कबीर रेख सिंदूर की, काजल दिया न जाए।
    तन में, मन में प्रीतम बसा, दूजा कहाँ समाए॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आँखों में काजल कैसे लगाया जाय, जबकि उनमें सिन्दूर की जैसी रेख उभर आयी है! अब मेरा रमैया अर्थात् मेरे प्रभू नैनों में बस गए हैं, उनमें अब किसी और को बसा लेने की ठौर नहीं रही।
  • प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ।
    प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब, सब विष अमृत होइ॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा के प्रेमी को खोजता हुआ मैं इधर उधर घूम रहा हूँ, परंतु कोई भी प्रेमी अभी तक मुझे नहीं मिला। ऐसा मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि यदि ईश्वर-प्रेमी को दूसरा ईश्वर-प्रेमी मिल जाता है तो विषय-वासना रूपी विष को अमृत में बदलने में देर नहीं लगती।
  • जल परमानै माछली, कुल परमानै सुद्धि।
    जाको जैसा गुरु मिला, ताको तैसी बुद्धि॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जैसी जल की गहराई या मात्रा होती है छोटी-बड़ी मछलियां अपने आप को इस माहौल में ढाल लेती हैं और जैसा जिसका कुल(परिवार) होता है, वैसे संस्कार(अच्छे या बुरे) उसके अंदर आ ही जाते है ठीक उसी प्रकार जैसा गुरु जिसे मिलता है उसकी बुद्धि वैसी ही हो जाती है, अर्थात् वह गुरु के द्वारा दिखाए गए नज़रिए से दुनिया देखने लगता है!
  • बकरी पाती खात है ताकि काढ़ी खाल!
    जो नर बकरी खात है ताकी कौन हवाल?
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बकरी घास और पत्तियाँ खाती है फिर भी उसे मार उसका चमड़ा उतार लिया जाता है, अर्थात् जो बकरी घास पत्ती खाती है , हत्यारे ने उसकी देह की खाल निकाल ली ! परन्तु जो लोग बकरी को ही खाते हैं , तो उनका फिर क्या हाल होगा ? अर्थात इसके बदले उन्हें कितना भारी दंड भोगना पड़ेगा प्रभू ही जानें।
  • मांस अहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जानि।
    ताकी संगति मति करै, होई भक्ति में हानि॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति मांस का आहरण करता है उनको राक्षस से कम मत समझना! और ऐसे लोगों की संगति भी करने से बचना चाहिए नहीं तो प्रभु से मिलन के मार्ग में बाधा आ जायेगी।
  • सूरा के मैदान में, कायर का क्या काम।
    कायर भागे पीठ दे, सूरा करे संग्राम॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तुम्हारा युद्ध किसी और से नहीं खुद से ही है! तुम्हे जीतना भी खुद को है न कि जगत को, तुम्हारा युद्ध है तुम्हारी सोच-समझ से, संसार से बंधी तुम्हारी आशाओं से, तुम्हारी इच्छाओं से, तुम्हारी आसक्तियों से, तुम्हारे विचारों से, इन सब को मिलाकर ही तुम्हारा वर्तमान स्वरुप बना है। तुम कोई शरीर नहीं, शरीर तो मात्र इन सबकी पूर्ति करने का साधन है असल में तुम इन सब का समूह हो ! जगत जीतना आसान है पर खुद से तो कोई सूरमा (योद्धा) ही जीत सकता है। अतः इस युद्ध में कोई कायर नहीं टिक पाता क्योंकि जब परिस्थितियाँ आती है तब तुम्हारे इसी स्वरुप के कारण तुम नकारात्मक ऊर्जा और उससे उठे विचारों से घिर जाते हो। तुम्हारे ही स्वरुप का तुम्हारे ऊपर आक्रमण होता है। ऐसे में दो रास्ते होते हैं एक खुद के इसी संसारी स्वरुप को बचाते हुए कायर की तरह पीठ दिखा कर पुनः संसार की और भाग जाना और दूसरा वो जिसे प्रेम क़री डोर बांधे रखती है और वह विश्वास और धीरज के साथ राह पर टिका रहता है, और इस नकारात्मक ऊर्जा को प्रेम की तलवार से काट फेंकता है । ऐसा सूरमा ही अपने मन के साथ संग्राम कायम रखता है।
  • साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे राखे मोय।
    जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जैसे साबुन को यदि गाँठ बाँध कर रख दें और कपड़े धोने लगें तो कैसे कपड़ों का मैल जायेगा? मैल निकालने का साथन होते हुए भी वह व्यर्थ है, ऐसे में अगर साबुन को दोष दिया जाए तो कहाँ उचित है वैसे ही यदि गुरुदेव की बात भले ही समझ में आ गई हो परंतु जब तक उन बातों को जीवन में नहीं उतारा गया तो आत्मा के ऊपर चड़ा हुआ मन का मैल नहीं जायेगा और सच्चे ज्ञान की अनुभूति नहीं होगी।
  • मल मल धोएं शरीर को, धोएं ना मन का मैल।
    नहाए गंगा गोमती रहे बैल के बैल॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग शरीर का मैल तो साफ़ करते हैं, लेकिन मन का मैल तो साफ़ करते ही नहीं! वे गंगा और गोमती जैसी नदियों में नहाकर खुद को पवित्र मानने तो लगते हैं, लेकिन मन की सफ़ाई न होने के कारण पूरे जीवन मूर्ख के मूर्ख ही बने रहते हैं!! इसलिए अगर आप पवित्र नदियों में स्नान नहीं भी कर पा रहे हो तो कोई बात नहीं पर मन की सफ़ाई के लिए प्रभु का लगातार चिंतन/गायन करते रहो इसी से मुक्ति के द्वार खुल जाएंगे!
  • सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
    दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में सब अपने सुखों में बहुत मगन हैं। वे खाते हैं, पीते हैं, मौज मस्ती करते हैं और सो जाते हैं, वे संसार के विषय-वासनाओं में उलझे हैं उसे ही सच्चा सुख मान बैठे हैं, वे क्षणिक सुख रूपी अज्ञान के अंधेरे में खुद गुमा चुके हैं और ज्ञान रूपी ईश्वर की भक्ति के सच्चे सुख से वंचित है, जबकि सच्चा सुख तो प्रभु की भक्ति है। संसार के लोगों यह हालत देख कर कबीर को रोना आ रहा है,और वो इसी चिंता में दुखी हैं।
  • प्रीत ना कीजिये पंछी जैसी, पेड़ सुखे तो उड़ जाये।
    प्रीति कीजिये मछली जैसी, जल सूखे तो मर जाए॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर आप किसी से प्रेम करें तो मछली जैसा ही करें पंछी जैसा नहीं क्योंकि पंछी किसी स्थान पर जब तक ही रहते है जब तक उस स्थान पर पानी(स्वार्थ) रहता है बल्कि मछली किसी स्थान का त्याग अपनी मृत्यु तक भी नहीं करती है!
  • विषय वासना उरझिकर, जनम गँवाया बाद।
    अब पछितावा क्या करे, निज करनी कर याद॥
    प्रस्तुत दोहे में संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में विषय-वासनाओं (सांसारिक सुखों और इच्छाओं) में उलझकर अपना कीमती समय और जीवन बर्बाद कर देता है। जब समय बीत जाता है और उसे अपनी गलतियों का एहसास होता है, तब वह पछताता है। लेकिन तब पछताने का कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि उसे अपने कर्मों (किए गए कार्यों) का फल भुगतना पड़ता है। इस दोहे में संत कबीर जी यह संदेश दे रहे हैं कि मनुष्य को सांसारिक मोह-माया और वासनाओं में फंसकर अपना जीवन नष्ट नहीं करना चाहिए। उसे सही समय पर सचेत होकर अच्छे कर्म करने चाहिए, ताकि भविष्य में पछताना न पड़े। यह जीवन एक अमूल्य अवसर है, इसे सही दिशा में लगाना चाहिए।
  • कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
    बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई॥
    कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।
  • जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
    जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई॥
    कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।
  • कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।
    ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस॥
    कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले।
  • पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
    एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात॥
    कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है। जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी।
  • हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास।
    सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥
    यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है।
  • जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
    जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
    इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।
  • झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
    खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद॥
    कबीर कहते हैं कि अरे जीव! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।
  • ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस।
    भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस॥
    कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।
  • संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत।
    चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत॥
    सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।
  • कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
    जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।
    कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।
  • तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
    सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ॥
    शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।
  • कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
    सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय॥
    कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।
  • माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
    आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर॥
    कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।
  • मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
    पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई॥
    मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।
  • साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय।
    मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥
    कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये, मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ।
  • काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
    पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब॥
    कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और जो आज करना है उसे अभी करो, कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे।
  • लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट।
    पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट॥
    कबीर दस जी कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है, अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम भगवान् की पूजा क्यों नहीं की।
  • माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
    माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख॥
    माँगना मरने के बराबर है, इसलिए किसी से भीख मत मांगो। सतगुरु कहते हैं कि मांगने से मर जाना बेहतर है, अर्थात पुरुषार्थ से स्वयं चीजों को प्राप्त करो, उसे किसी से मांगो मत।
  • आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।
    अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि सुख के समय में भगवान् का स्मरण नहीं किया, तो अब पछताने का क्या फ़ायदा। जब खेत पर ध्यान देना चाहिए था, तब तो दिया नहीं, अब अगर चिड़िया सारे बीज खा चुकी हैं, तो खेद से क्या होगा।
  • आपा तजे हरि भजे, नख सिख तजे विकार।
    सब जीवन से निर्भैर रहे, साधू मता है सार॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने अहम् को छोड़कर, भगवान् कि उपासना करता है, अपने दोषों को त्याग देता है, और किसी जीव-जंतु से बैर नहीं रखता, वह व्यक्ति साधू के सामान और बुद्धिमान होता है।
  • आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक।
    कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि अगर गाली के जवाब में गाली दी जाए, तो गालियों की संख्या एक से बढ़कर अनेक हो जाती है। कबीर कहते हैं कि यदि गाली को पलटा न जाय, गाली का जवाब गाली से न दिया जाय, तो वह गाली एक ही रहेगी।
  • एसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
    औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि अगर अपने भाषा से अहं को हटा दिया जाए, तो दूसरों के साथ खुद को भी शान्ति मिलती है।
  • बाहर क्या दिखलाये, अंतर जपिए राम।
    कहा काज संसार से , तुझे धानी से काम॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि बाहरी दिखावे कि जगह, मन ही मन में राम का नाम जपना चाहिए। संसार कि चिंता छोड़कर, संसार चलाने वाले पर ध्यान देना चाहिए।
  • बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
    पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर॥
    कबीरदास जी कहते हैं कि खजूर का पेड़ न तो राही को छाया देता है, और न ही उसका फल आसानी से पाया जा सकता है। इसी तरह, उस शक्ति का कोई महत्व नहीं है, जो दूसरों के काम नहीं आ सकती।
  • भगती बिगाड़ी कामिया, इन्द्री करे सवादी।
    हीरा खोया हाथ थाई, जनम गवाया बाड़ी॥
    इच्छाओं और आकाँक्षाओं में डूबे लोगों ने भक्ति को बिगाड़ कर केवल इन्द्रियों की संतुष्टि को लक्ष्य मान लिया है। इन लोगों ने इस मनुष्य जीवन का दुरूपयोग किया है, जैसे कोई हीरा खो दे।
  • बूँद पड़ी जो समुंदर में, जानत है सब कोय।
    समुंदर समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय॥
    एक बूँद का सागर में समाना – यह समझना आसान है, लेकिन सागर का बूँद में समाना – इसकी कल्पना करना बहुत कठिन है। इसी तरह, सिर्फ भक्त भगवान् में लीन नहीं होते, कभी-कभी भगवान् भी भक्त में समा सकते हैं।
  • चली जो पुतली लौन की, थाह सिंधु का लेन।
    आपहू गली पानी भई, उलटी काहे को बैन॥
    जब नमक सागर की गहराई मापने गया, तो खुद ही उस खारे पानी मे मिल गया। इस उदाहरण से कबीर भगवान् की विशालता को दर्शाते हैं। जब कोई सच्ची आस्था से भगवान् खोजता है, तो वह खुद ही उसमे समा जाता है।
  • चिड़िया चोंच भरि ले गई, घट्यो न नदी को नीर।
    दान दिये धन ना घटे, कहि गये दास कबीर॥
    जिस तरह चिड़िया के चोंच भर पानी ले जाने से नदी के जल में कोई कमी नहीं आती, उसी तरह जरूरतमंद को दान देने से किसी के धन में कोई कमी नहीं आती।
  • दया भाव ह्रदय नहीं, ज्ञान थके बेहद। ते नर नरक ही जायेंगे , सुनी सुनी साखी शब्द॥कुछ लोगों में न दया होती है और न हमदर्दी, मगर वे दूसरों को उपदेश देने में माहिर होते हैं। ऐसे व्यक्ति, और उनका निरर्थक ज्ञान नर्क को प्राप्त होता है।
  • दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करै न कोय।
    जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे होय॥
    दुःख में परमात्मा को सभी याद करते हैं, परन्तु सुख में कोई नहीं। यदि सुख में भी परमात्मा को याद रखते, तो दुःख होता ही नहीं।
  • ज्ञानी मूल गँवाईया, आप भये करता।
    ताते संसारी भला, जो सदा रहे डरता॥
    जो विद्वान अहंकार में पड़कर खुद को ही सर्वोच्च मानता है, वह कहीं का नहीं रहता। उससे तो वह संसारी आदमी बेहतर है, जिसके मन में भगवान् का दर तो है।
  • हरि रस पीया जानिये, कबहू न जाए खुमार।
    मैमता घूमत फिरे, नाही तन की सार॥
    जिस व्यक्ति ने परमात्मा के अमृत को चख लिया हो, वह सारा समय उसी नशे में मस्त रहता है। उसे न अपने शरीर कि, न ही रूप और भेष कि चिंता रहती है।
  • जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश।
    मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास॥
    शुद्ध हृदय के साथ भगवान् को याद करने से सारे पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे कि सूखी घास पर आग की चिंगारी पड़ी हो।
  • जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय।
    यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए॥
    आपके मन में यदि शीतलता है, अर्थात दया और सहानुभूति है, तो संसार में आपकी किसी से शत्रुता नहीं हो सकती। इसलिए अपने अहंकार को निकाल बाहर करें, और आप अपने प्रति दूसरों में भी समवेदना पाएंगे।
  • जहाँ दया तहाँ धर्म है,जहाँ लोभ तहाँ पाप।
    जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप॥
    जहाँ दया-भाव है, वहाँ धर्म-व्यवहार होता है। जहाँ लालच और क्रोध है वहाँ पाप बसता है। जहाँ क्षमा और सहानुभूति होती है, वहाँ भगवान् रहते हैं।
  • जहाँ न जाको गुन लहै, तहाँ न ताको ठाँव।
    धोबी बसके क्या करे, दीगम्बर के गाँव॥
    जहाँ पर आपकी योग्यता और गुणों का प्रयोग नहीं होता, वहाँ आपका रहना बेकार है। उदाहरण के लिए, ऐसी जगह धोबी का क्या काम, जहाँ पर लोगों के पास पहनने को कपड़े नहीं हैं।
  • जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय।
    जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय॥
    शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं। अर्थात, जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।
  • ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग।
    तेरा साईं तुझमे है, तू जाग सके तो जाग॥
    जिस तरह तिल में तेल होता है, और पत्थरों से आग उत्पन्न हो सकती है, उसी प्रकार भगवान् भी आपके अंतर्गत हैं। उन्हें जगाने की शक्ति पैदा करने की आवश्यकता है।
  • कबीर क्षुधा कूकरी, करत भजन में भंग।
    वाकूं टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग॥
    संत कबीरदास कहते हैं कि भूख ऐसी कुतिया के समान होती है, जो कि भजन साधना में बाधा डालती है। इसे शांत करने के लिए अगर समय पर रोटी का टुकडा दे दिया जाए तो फिर संतोष और शांति के साथ ईश्वर का स्मरण हो सकता है।
  • कबीरा गर्व ना कीजिये, ऊंचा देख आवास।
    काल पड़ो भू लेटना, ऊपर जमसी घास॥
    अपना शक्ति और संपत्ति देख कर घमंडी मत बनिए। जब इस शरीर से आत्मा निकल जाती हैं तो सबसे शक्तिशाली मनुष्य का देह भी धरती में दाल दिया जाता है, और उसके ऊपर घास उग जाती है।
  • कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान।
    जम जब घर ले जाएँगे, पड़ा रहेगा म्यान॥
    अपना सारा समय सोते हुए मत बिताइए। भगवान् को याद कीजिये, क्योंकि यमराज के आने पर (अर्थात मृत्यु के समय ), बिन आत्मा का यह शरीर उस तरह होगा, जैसे बिना तलवार के म्यान।
  • कबीरा तेरी झोपडी, गल कटीयन के पास।
    जैसी करनी वैसे भरनी, तू क्यों भया उदास॥
    कबीर! तेरा घर कसाई के पास है तो क्या? उसकी हरकतों के लिए तू ज़िम्मेदार नहीं है। अर्थात, अपने कर्मों का फल सबको खुद ही भुगतना पड़ता है।
  • कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा।
    कई सेवा कर साधू की , कई गोविन्द गुण गा॥
    हर व्यक्ति कि मृत्यु तो निश्चित है। इसीलिए अपना जीवन काल उचित एवं लाभकारी कामों में लगाना चाहिए, जैसे कि साधुओं की सेवा और भगवान् कि भक्ति।
  • कहे कबीर कैसे निबाहे, केर बेर को संग।
    वह झूमत रस आपनी, उसके फाटत अंग॥
    कबीर कहते हैं कि विभिन्न प्रकृति के लोग एक साथ नहीं रह सकते। उदाहरण के लिए, केले और बेर का पेड़ साथ नहीं उग सकते, क्योंकि जब हवा से बेर का पेड़ हिलेगा तो उसके काँटों से केले के पत्ते नष्ट हो जायेंगे।
  • करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात।
    कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात॥
    अज्ञानी व्यक्ति काम कम और बातें अधिक करते हैं। ऐसे लोग खुद अपना तर्क रखने के बजाय सुनी सुनाई बातों को ही रटते रहते हैं।
  • खाय पकाय लूटाय ले, करि ले अपना काम।
    चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम॥
    मनुष्य को इस जीवन में अपनी शक्ति और साधन का भरपूर प्रयोग करना चाहिए – अपने कामों के लिए, दूसरों कि सहायता के लिए और परोपकार के कार्यों में। इस तरह उसे अपना जीवन सार्थक करना चाहिए, क्योंकि संसार से जाते समय एक भी वस्तु उसके साथ नहीं जायेगी।
  • कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि।
    बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि॥
    जो हर पहर जागता रहता है, उसके कपड़े और बर्तन कोई नहीं ले जा सकता। अर्थात, हमेशा सचेत और सावधान रहना चाहिए।
  • कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे हॉट न हार।
    साधू बचन जल रूप है , बरसे अमृत धार।।
    कटु शब्दों और तानों से बदन में जलन की भावना होती है, जब कि मधुर शब्द सुनकर ठंडक पहुँचती है, और ऐसा लगता है कि जैसे अमृत बरस रहा हो ।
  • क्या मुख ली बिनती करो, लाज आवत है मोहि।
    तुम देखत ओगुन करो, कैसे भावो तोही॥
    हे भगवान् ! तुझसे प्रार्थना करते हुए मुझे शर्म आती है। क्या तुम मेरी गलतियों और मेरे पापों के बावजूद मुझे अपना सकते हो?
  • मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
    जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार॥
    दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं, पर जब वह नहीं मिलता तब वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
  • माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
    एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥
    मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तो तू मुझे पैरों के नीचे रोंद रहा है, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा, कि तू मेरे तले होगा। अर्थात, जीवन में मनुष्य चाहे जितना भी शक्तिशाली हो, मृत्यु के बाद उसका शरीर मिट्टी हो जाता है।
  • माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहि।
    मनुआ तो चहुं दिश फिरे, यह तो सुमिरन नाहि॥
    माला घुमाने से, या मंत्रो का उच्चारण करने से ध्यान नहीं होता। अर्थात ध्यान होता है मन को स्थिर करने से, क्रियाएं करने से नहीं।
  • मन उन्मना न तोलिये, शब्द के मोल न तोल।
    मुर्ख लोग न जान्सी, आपा खोया बोल॥
    अशांत या व्याकुल अवस्था में किसी के कही हुई बातों का अर्थ नहीं निकलना चाहिए। ऐसी हालत में व्यक्ति शब्दों का सही अर्थ समझने में असमर्थ होता है। मूर्ख लोग इस तथ्य को नहीं जानते, इसलिए किसी भी बात पर अपना संतुलन खो देते हैं।
  • मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
    कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग॥
    रात दिन भगवान के नाम जपने, और रोज़ साधुओं के साथ संगत करने के बावजूद, कुछ लोगों पर भक्ति का रंग नहीं चढ़ता, क्योंकि वे अपने अंदर के विकारों से मुक्त नहीं हो पाते।
  • <!– 7 July, 2025

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    How to wish Happy Diwali (शुभ दिपावली) SMS। Wishes in Hindi text?

    Here is collection 2019 collection of Happy Diwali 140 character in Hindi writing text ( language। font ) SMS ( msg। message ) Wishes, status and quotes for whatsapp and social media

    शुभ दिपावली शुभकामनाएं। शुभकामना मेसेज। संदेश हिन्दी

    आप सभी को दिपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं,
    रोशनी का यह पर्व आपके जीवन मे अपार खुशियाँ और उन्नति लाये.
    Happy diwali.

    🌹🌹🌹 दिपावली की हार्दिक बधाई 🌹🌹🌹
    =================================

    *दीपावली की शुभकामनाएं*
    दीप जलते रहे मन से मन मिलते रहे
    गिले सिकवे सारे मन से निकलते रहे
    सारे विश्व मे सुख-शांति की प्रभात ले आये
    ये दीपो का त्योहार खुशी की सोंगात ले आये

    🌹🌹🌹 Happy Diwali 🌹🌹🌹
    =================================

    दिपावली के पावन पवँ की आपको और,
    आपके परीवार को मेरी और से ढेर सारी शुभकामना….

    🌹🌹🌹 Happy Diwali 🌹🌹🌹
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    दिवाली के शुभ त्योहार पे हम

    दिलसे यही चाहते है की

    सब दोस्तो और रिश्तेदारो

    के प्रति हम अपने दिलमें

    प्यारके और विश्वास के दिये

    हमेशा जलाए रक्खे …..

    क्यों की रिश्तो के बीना तो जीवन ही नहीं

    सबको अपनी अपनी मंज़िल मिले

    सबकी सब मनोकामनाए पूर्ण हो

    यही प्रार्थना मै ईश्वर से कर्ती हूँ……..

    🌹 HAPPY DIWALI AND PROSPARAS NEW YEAR 🌹
    =================================

    है रौशनी का त्यौहार,
               लाये हर चेहरे पर मुस्कान,
    सुख और समृधि की बहार ,
              समेट लो सारी खुशियाँ,
    अपनों का साथ और प्यार..
                   इस पावन अवसर पर आप सभी को दीवाली का प्यार..happy diwali

    🌹🌹🌹 दिपावली की हार्दिक बधाई 🌹🌹🌹
    =================================

    सुप्रभात Good Morning
    मेरे सभी सुविचार परिवार के सदश्यो को दीपावली के शुभ अवसर की बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभ कामनाये
         हम सभी सुविचार admins आपके परिवार की खुशहाली की मंगलकामना करते है
    माँ महालक्ष्मी सदेव आपके घर विराजे सुख-सम्पति-वैभव प्रदान करे
    इसी आशा के साथ।। जय श्री कृष्ण ।।

    🌹🌹🌹 Happy Diwali 🌹🌹🌹
    =================================

    दीपमलिका की ये जगमग ज्योति
    आपके जीवन को सुख समृदि और
    वैभव से परिपूणॅ करे नूतन वषॅ मे
    मेरी यही शुभकामँनाए है
    आप सभी को दीपावली पवॅ की

    🌹🌹🌹 शुभ दिपावली 🌹🌹🌹
    =================================

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    चाँद *की* चाँदनी,
        *बसंत* की *बहार,*
    फूलो *की* खुशबू,
        *अपनों* का *प्यार,*
    शुभकामनाएं *हो* आपको ये दिवाली का त्यौहार
         सदा *खुश* रहे *आप* और *आपका* परिवार ।।

    🌹🌹🌹 दिपावली की हार्दिक बधाई 🌹🌹🌹
    =================================

    शुभ दिपावली आपको व आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए।

    🌹 HAPPY DIWALI AND PROSPARAS NEW YEAR 🌹
    =================================

    *ll शुभ दीपावली 🌹ll* 

    *मेरे एवम मेरे परिवार की ओर से
    मेरे ईष्ट मित्रों , स्नेहीजनो , सहयोगी बन्धुओं ,
    आपको एवं आपके पुरे परिवार को
    दिपावली के पावन पर्व की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई  ।।*

    🌹🌹🌹 शुभ दिपावली 🌹🌹🌹
    =================================

    दीपावली की राम राम
    चलिये बरसो पुराना फैशन ले आएं त्यौहार मनाने का
    शायद महंगाई भी कम हो जाएं
    दिए जलाएं जम कर करें आतिश बाज़ी

    श्री राम जी आपके दुखों का नाश करें और आपके जीवन में सुख लाएं,
    रोशनी के दीये आपके घर में खुशहाली लाएं,

    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!!

    श्री राम आए थे अवध में
    उत्सव सा छाया था महल में
    सब ओर छाई रोशनी
    जगमग दिए, जगमग दिए, जगमग दिए
    आई है शुभ #दीपावली

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